जवाब देही है तेरी तुझी से पूछूंगा
ऐ मेरे मुल्क के रहबर तूं मुझसे ऑख मिला
जन अदालत, बेहट, सहारनपुर
दिनांक 25 मई 2025
जनता इंटर कॉलेज, शाकुम्भरी रोड, बेहट
जिला सहरानपुर उत्तर प्रदेश
समय : प्रातः 11 बजे से
दिन : रविवार
साथियो!
अपने अधिकारों के प्रति सजग होना हर समुदाय की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है और संविधान की मूल भावना को समाज के आख़िरी व्यक्ति तक पहंुचाना सरकार की ज़िम्मेदारी है। लेकिन इस कर्तव्य को वन आश्रित समुदायों के प्रति निभाने में आज़ादी के बाद से चुनी गई सभी सरकारें नाकाम रही हैं। ऐसे कई समुदाय हैं जैसे घुमंतू वन गुज्जर समुदाय, वन टांगिया समुदाय और जंगलो से जुड़े सैकड़ों हकदारी गाँव, जो संविधान की मूल भावना आज़ादी से ही वंचित रहे और अंग्रेजों की बनाई संस्था वन विभाग की गुलामी से मुक्त नहीं हो पाए। लेकिन आखिरकार 2006 में देश की संसद ने ऐतिहासिक कानून ‘‘अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वनाधिकारों की मान्यता) कानून-2006’’ पारित किया और वनाश्रित समुदायों को पहली बार अपनी आज़ादी का अहसास हुआ, जब उन्हें वनों में उनके संवैधानिक अधिकारों की मान्यता मिली। यह मान्यता तो ज़रूर मिली लेकिन सरकारों की राजनैतिक इच्छाशक्ति न होने के कारण अभी तक ये कानून पूर्ण रूप से धरातल पर लागू नहीं किया गया है। जिसकी वजह से वन विभाग के अत्याचार दिन-ब-दिन बढ़ते ही चले जा रहे हैं। ऐसे में 2019-20 में कोरोना काल शुरू हो गया, उसके बाद तो आम नागरिकों के जन तांत्रिक कानूनों पर ही सरकार द्वारा कुठाराघात किया गया। और कोरोना की आड़ में तमाम श्रमशक्ति के रोज़गार तो छीन ही लिए गए और साथ ही जु़ल्म-ओ-ज़्यादती भी हद से ज्यादा बढ़ गई। वनाश्रित समुदायों को बिना नोटिस दिये जंगलो से खदेड़ा जाने लगा, जो कि वन विभाग की शह पर किया जाने लगा। वन विभाग और पुलिस कर्मियों द्वारा जंगलों से वन आश्रित समुदायों की बेदख़ली की जाने लगी। कोरोना के दौरान दिए गए तमाम निर्देशों का उल्लंघन करते हुए वनाधिकारों से वंचित किया गया। जबकि देश में 2006 का वनाधिकार कानून लागू चुका था। लोगों के रोज़गार पर हमला हुआ, बात-चीत करने पर प्रतिबंध लगा, यहां तक कि खेती पर निर्भरशील समुदायों को खेती करने के लिए अपने खेतों में भी चोरी-छिपे जाना पड़ रहा था।
इसी कोरोना काल के दौरान शिवालिक वन प्रभाग में जहां ऐतिहासिक रूप से आदिवासी वन गुज्जर समुदाय की बस्तियाँ जंगल में बड़े पैमाने पर मौजूद हैं, वहाँ पर वन विभाग द्वारा शासन को गलत जानकारी देते ये रिपोर्ट भेजी गई कि जंगलो में कोई बस्ती ही नहीं है। इसी झूठी रिपोर्ट के आधार पर भारतीय फौज को शिवालिक जंगलो में ट्रेनिंग कैंप की अनुमति मिली। फौज की गोलाबारी की ट्रेनिंग के चलते ऐसे कई हादसे हो चुके हैं, जिसमें यहां रहने वाले वनाश्रित समुदाय वन गुज्जरों को काफी जान-माल का नुकसान हुआ। जिसमें बड़कला खोल के पुरुष वन गुज्जर साथी गुलाम मुस्तफ़ा की मौत हो गई और पशुपालन पर निर्भरशील इस समुदाय की दो भैंसों की भी मौत हो गई। इसी गोलाबारी के चलते इससे पहले 2017 में चपड़ी खोल में 28 वर्षीय महिला फातिमा की भी मौत हो गई थी। इतना ही नहीं इस गोलाबारी से जंगलक्षेत्र के जंगली जानवरों की हो चुकी मौतों की तो गिनती ही नहीं है, इसके अलावा जंगल के पेड़ पौधों को हो रहे नुकसान का तो कुछ अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता। इस तरह के कई और हादसे हो चुकने के बावजूद, गोलाबारी के लिए तय किया गया क्षेत्र बढ़ते-बढ़ते अब जंगलों के आस-पास के गांवों के काफी नज़दीक पहुँच गया है। लेकिन यह गोलाबारी की ट्रेनिंग रुकने का नाम नहीं ले रही है और भारतीय फौज द्वारा अब यहां के पूरे जंगल को गोलाबारी की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि उनको एक सीमित क्षेत्र में ही फायरिंग रेंज की अनुमति दी गई थी। फौज को ऐसे परीक्षण के लिए वन विभाग द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया जाता है, लेकिन वन विभाग द्वारा सेना को झूठी रिपोर्ट दी गई कि यहां जंगल में लोग नहीं रहते हैं।
हमारे कानून भारतीय फौज को किसी भी आबाद बस्ती के इलाके में अपने घातक अस्लाह के साथ ट्रेनिंग करने की इजाज़त नहीं देते हैं। यह भारतीय फौज का सिद्धांत है कि वह सीमा की रक्षा के लिए और देश की सुरक्षा के लिए तैनात की जाती हैं ना कि अपने देश के आम नागरिकों का नुक्सान करने के लिए, वन विभाग अगर इन इलाकों में नागरिकों के न होने की झूठी रिपोर्ट सरकार को ना दे तो इन हादसों को आसानी से रोका भी जा सकता हैै।
शिवालिक पर्वतों की इन पहाड़ियों में जहां पर घनी आबादी मौजूद है वहाँ फौज द्वारा परीक्षण के दौरान कई बम फट नहीं पाते हंै और ऐसे में जब लोग अपने मवेशी चराने जाते हैं या फिर औरतें, बच्चे घास लेने जाते हंै तब ये बम अचानक फट जाते हैं, जिस से वहां मौजूद लोगों की जान चली जाती है। इस्तेमाल किए गए इस अस्लेह का मलबा भी काफ़ी होता है, जिसका ठेका वन विभाग द्वारा लिया जाता है और जो कि वन विभाग की मोटी कमाई का ज़रिया बना हुआ है। इस तरह से जंगलो में और आसपास गांव के रहने वाले स्थानीय लोग अपने वनाधिकारों से वंचित किये जा रहे हैं और वन विभाग के लोग संसद के बनाए कानून की अवहेलना कर रहे हैं।
इसी प्रकार कोरोना काल में भी जिस तरह से लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ उसने लोगो के स्वास्थ्य के अधिकारों से उनको वंचित किया, साथ ही उनके साथ व्यापक तौर पर भेद-भाव किया गया। इसी दौरान वन विभाग ने पूरी फोर्स के साथ कई वन गुज्जर परिवारों को वनों से बेदख़ल कर दिया। इसी तरह से वन टांगिया और जंगलो के आस-पास बसे गांवों के भी बुनियादी अधिकारों को कुचला जा रहा है।
इन्ही सब मामलों को लेकर आगामी 25 मई 2025 को बेहट, सहारनपुर में हम एक जन सुनवाई आयोजित करने जा रहे हंै, जिसमे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि सांसद कैराना सुश्री इकरा हसन, सांसद सहारनपुर श्री इमरान मसूद, विधायक बेहट श्री उमर अली, नगर पालिका अध्यक्ष श्री अब्दुल रहमान, एड0 जां निसार चौधरी सहारनपुर, एड0 दिलनिसार चौधरी हाई कोर्ट इलाहाबाद, एड0 अमन, एड0 तारिक और एड0 फवाज सुप्रीम कोर्ट, सुश्री भाषा सिंह स्वतंत्र पत्रकार, मौ0 अहमद काज़मी एडवोकेट बेहट जैसी कई जानी मानी हस्तियां बतौर जनता की अदालत के जज होंगे। इस जाँच कमेटी में मानवधिकारो के हनन के केस स्वयं पीड़ितों द्वारा रखे जायेंगे। अनुरोध है कि इस जन सुनवाई में ज़्यादा से ज़्यादा लोग शामिल हों।
क्रांतिकारी अभिनंदन
आयोजक
अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन
एवम
जनता द्वारा गठित जन जाँच समिति
